शफीकुर रहमान: प्रतिबंध से सत्ता की दहलीज तक, बांग्लादेश की राजनीति का नया चेहरा
बांग्लादेश की सियासत एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। प्रधानमंत्री पद की दौड़ में इस बार जिस नाम ने सबसे ज्यादा चर्चा बटोरी है, वह है जमात-ए-इस्लामी के अमीर शफीकुर रहमान। कभी प्रतिबंध और जेल का सामना करने वाले 67 वर्षीय रहमान आज सत्ता के केंद्र में नजर आ रहे हैं। सवाल यह है कि क्या यह उभार स्थायी होगा या विवाद उनके रास्ते में दीवार बनेंगे?
डॉक्टर से राजनेता तक: शुरुआती सफर
1958 में मौलवीबाजार जिले में जन्मे शफीकुर रहमान पेशे से डॉक्टर हैं। उन्होंने सिलहट के एमएजी उस्मानी मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की पढ़ाई की और बाद में एक निजी अस्पताल की स्थापना की। उनका परिवार भी चिकित्सा पेशे से जुड़ा है। छात्र जीवन में उन्होंने राजनीति में कदम रखा और बाद में इस्लामी छात्र संगठनों के जरिए जमात-ए-इस्लामी से जुड़े। 1980 के दशक में उन्होंने औपचारिक रूप से पार्टी की सदस्यता ग्रहण की।
जमात पर प्रतिबंध और कानूनी चुनौतियां
जमात-ए-इस्लामी लंबे समय तक 1971 के युद्ध अपराधों के आरोपों के कारण विवादों में रही। पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं को सजा मिली। शेख हसीना के शासनकाल में जमात पर प्रतिबंध लगाया गया था। शफीकुर रहमान को भी 2022 में एक प्रतिबंधित संगठन से कथित संबंधों के आरोप में गिरफ्तार किया गया और उन्हें करीब 15 महीने जेल में रहना पड़ा।
राजनीतिक बदलाव के बाद पार्टी पर लगे प्रतिबंधों में ढील दी गई, जिससे जमात को फिर से सक्रिय राजनीति में जगह मिली। यही वह मोड़ था जहां से रहमान का राष्ट्रीय स्तर पर उभार तेज हुआ।
राजनीतिक शून्य में उभरता नेतृत्व
देश में बड़े दलों की सक्रियता कमजोर होने और नेतृत्व संकट के बीच शफीकुर रहमान ने खुद को विकल्प के रूप में पेश किया। उन्होंने देशभर का दौरा किया, राहत कार्यों और सामाजिक अभियानों में हिस्सा लिया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उस दौर में स्पष्ट नेतृत्व के अभाव ने उन्हें अपनी पकड़ मजबूत करने का अवसर दिया।
नई छवि गढ़ने की रणनीति
जमात की छवि को लेकर लंबे समय से आलोचना होती रही है। रहमान ने अतीत की “गलतियों” की बात तो स्वीकार की, लेकिन स्पष्ट आत्मस्वीकृति से दूरी बनाए रखी। वे खुद को मध्यमार्गी और सुधारवादी नेता के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। उन्होंने अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा और भ्रष्टाचार मुक्त शासन का वादा किया है।
हालांकि आलोचकों का कहना है कि यह छवि निर्माण की रणनीति है, जबकि समर्थक इसे व्यावहारिक राजनीति बताते हैं।
महिलाओं पर बयान से विवाद
रहमान और उनकी पार्टी महिलाओं की भूमिका को लेकर दिए गए बयानों के कारण आलोचना झेल चुकी है। कार्यघंटों और सामाजिक भूमिकाओं पर दिए गए उनके विचारों को लेकर विश्वविद्यालय परिसरों में विरोध प्रदर्शन हुए। पार्टी ने कुछ विवादित सोशल मीडिया पोस्ट से दूरी बनाते हुए अकाउंट हैक होने का दावा किया था, लेकिन बहस थमी नहीं।
चुनावी वादे: 2040 तक 2 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था?
शफीकुर रहमान ने दावा किया है कि यदि उनकी पार्टी सत्ता में आती है तो 2040 तक बांग्लादेश की जीडीपी चार गुना बढ़ाकर 2 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचाई जा सकती है। उनके घोषणापत्र में तकनीक आधारित कृषि, विनिर्माण, आईटी सेक्टर, शिक्षा और स्वास्थ्य में निवेश बढ़ाने की बात कही गई है।
हालांकि अर्थशास्त्रियों का एक वर्ग इन वादों को महत्वाकांक्षी तो मानता है, लेकिन वित्तीय स्रोतों और क्रियान्वयन की स्पष्ट योजना पर सवाल उठाता है।
क्या प्रधानमंत्री पद तक पहुंचेगा सफर ? –
शफीकुर रहमान का राजनीतिक सफर बांग्लादेश की बदलती राजनीति का संकेत है। प्रतिबंध, जेल और विवादों के बावजूद उनका उभार यह दिखाता है कि देश में वैकल्पिक नेतृत्व की तलाश जारी है।
फिर भी, उनके सामने चुनौती दोहरी है—एक ओर आर्थिक और प्रशासनिक विश्वसनीयता साबित करना, दूसरी ओर अतीत की राजनीतिक छवि से दूरी बनाना। आने वाले चुनाव यह तय करेंगे कि यह उभार अस्थायी लहर है या स्थायी राजनीतिक परिवर्तन।