32 साल पुरानी शादी खत्म: कोर्ट बोला- बेवजह मुकदमे और अलगाव भी ‘क्रूरता’
राजस्थान के पारिवारिक न्यायालय ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक अहम मामले में 32 साल पुराने विवाह को समाप्त करते हुए स्पष्ट किया कि मानसिक प्रताड़ना केवल शारीरिक हिंसा तक सीमित नहीं है। अदालत ने कहा कि बिना ठोस कारण के मुकदमों में उलझाना, लंबे समय तक अलग रहना और रिश्ते को सुधारने की कोशिश न करना भी तलाक का आधार बन सकता है।
कोर्ट का फैसला — 1994 का विवाह कानूनी रूप से समाप्त
पारिवारिक न्यायालय (प्रथम) की न्यायाधीश आरती भारद्वाज ने पति की याचिका स्वीकार करते हुए 29 अप्रैल 1994 को हुए विवाह को खत्म करने का आदेश दिया। अदालत ने माना कि लगातार विवाद और कानूनी लड़ाइयों से वैवाहिक संबंध सामान्य नहीं रह गए थे।
लंबे अलगाव और मुकदमों का विवाद
अदालत में प्रस्तुत जानकारी के अनुसार दंपति अक्टूबर 2017 से अलग रह रहे थे। पति ने आरोप लगाया कि पत्नी ने संपत्ति विवाद समेत कई दीवानी और आपराधिक मुकदमे दायर कर मानसिक दबाव बनाया, जिससे वैवाहिक संबंध और बिगड़ते गए।
सबूतों की कमी पर कोर्ट की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने पाया कि पत्नी अपने पक्ष में ठोस दस्तावेजी साक्ष्य पेश नहीं कर सकीं। अदालत ने यह भी नोट किया कि पति के कई आरोपों का स्पष्ट खंडन नहीं किया गया, जिससे मानसिक प्रताड़ना के दावे को बल मिला।
रिश्ता सुधारने की कोशिश न होना भी बना आधार
कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि लंबे अलगाव के बावजूद पत्नी ने विवाह अधिकार बहाली (धारा 9) के तहत कोई याचिका दाखिल नहीं की। इससे अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि संबंध सुधारने की इच्छा नहीं थी, जो अभित्यजन के आधार को मजबूत करता है।
कानूनी आधार — क्रूरता और अभित्यजन की धाराएं
फैसले में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(i-क) (क्रूरता) और धारा 13(1)(i-ख) (अभित्यजन) को आधार बनाया गया। अदालत ने स्पष्ट किया कि मानसिक उत्पीड़न, निराधार मुकदमे और लंबे अलगाव को भी इन धाराओं के तहत तलाक का आधार माना जा सकता है।
मानसिक क्रूरता की व्यापक परिभाषा
यह फैसला बताता है कि अदालतें अब वैवाहिक विवादों में मानसिक पीड़ा को भी गंभीरता से देख रही हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, यह निर्णय भविष्य के मामलों में मिसाल बन सकता है, जहां रिश्तों में कानूनी दबाव या लंबे अलगाव को क्रूरता के रूप में देखा जाएगा।