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सोने की दौड़ से हिला डॉलर का ताज? क्यों भारत-चीन बढ़ा रहे हैं गोल्ड रिजर्व

दुनिया भर में सोने की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। कभी सोना रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचता है तो कभी अचानक गिरावट आ जाती है। आम तौर पर इसे शादी-विवाह या बाजार की सामान्य चाल से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन असल वजह इससे कहीं ज्यादा गहरी और वैश्विक राजनीति से जुड़ी हुई है।

दरअसल, यह सिर्फ सोने की कीमतों की कहानी नहीं है, बल्कि दुनिया की बड़ी ताकतों के बीच चल रही आर्थिक रणनीति और भरोसे की लड़ाई है। मौजूदा हालात में कई देश अमेरिकी डॉलर से दूरी बनाकर सोने को सबसे सुरक्षित विकल्प मान रहे हैं।

जब करेंसी नहीं थी, तब कैसे चलता था कारोबार

आज से हजारों साल पहले दुनिया में न तो रुपये थे और न ही डॉलर। उस समय लोग वस्तु के बदले वस्तु के लेन-देन यानी बार्टर सिस्टम पर निर्भर थे। लेकिन इस व्यवस्था में जरूरतों का मेल बैठाना मुश्किल होता था।

करीब 3000 ईसा पूर्व में जौ, ऊन और चांदी जैसी वस्तुओं को भुगतान के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा। बाद में सोने-चांदी के सिक्के आए और फिर चीन ने कागजी नोटों की शुरुआत की, जिसने व्यापार को आसान बना दिया।

गोल्ड स्टैंडर्ड से डॉलर के वर्चस्व तक का सफर

19वीं सदी तक दुनिया गोल्ड स्टैंडर्ड सिस्टम पर चल रही थी, जिसमें देश उतनी ही मुद्रा छाप सकते थे जितना उनके पास सोना होता था। उस दौर में ब्रिटेन का पाउंड सबसे ताकतवर मुद्रा था।

लेकिन दोनों विश्व युद्धों ने ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था को कमजोर कर दिया। वहीं अमेरिका ने युद्ध के समय यूरोप को सामान बेचकर बदले में भारी मात्रा में सोना जमा कर लिया। दूसरे विश्व युद्ध के बाद दुनिया का अधिकांश सोना अमेरिका के पास पहुंच गया।

1944 में ब्रेटन वुड्स समझौते के बाद डॉलर को वैश्विक मुद्रा का दर्जा मिला और उसकी कीमत को सोने से जोड़ा गया।

अंधाधुंध खर्च और ‘निक्सन शॉक’

वियतनाम युद्ध और अन्य सैन्य अभियानों में अमेरिका ने जरूरत से ज्यादा डॉलर छाप दिए। जब देशों ने डॉलर के बदले सोना मांगना शुरू किया, तो अमेरिकी गोल्ड रिजर्व पर दबाव बढ़ गया।

1971 में राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने डॉलर को सोने से अलग करने का फैसला किया। यही वह मोड़ था, जब दुनिया पूरी तरह ‘फिएट मनी’ सिस्टम में चली गई, जहां मुद्रा की कीमत सरकार के भरोसे पर टिकी होती है।

तेल से बचाया गया डॉलर का दबदबा

डॉलर की मांग बनाए रखने के लिए अमेरिका ने 1970 के दशक में सऊदी अरब के साथ समझौता किया। इसके तहत सऊदी अरब केवल डॉलर में तेल बेचेगा और बदले में अमेरिका उसे सुरक्षा देगा।

यहीं से ‘पेट्रोडॉलर सिस्टम’ की शुरुआत हुई, जिसने दशकों तक डॉलर को वैश्विक अर्थव्यवस्था का केंद्र बनाए रखा।

रूस-यूक्रेन युद्ध से टूटा भरोसा

2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान अमेरिका और पश्चिमी देशों ने रूस के करीब 300 अरब डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार को फ्रीज कर दिया। इस कदम ने कई देशों को सोचने पर मजबूर कर दिया कि अगर भविष्य में अमेरिका से मतभेद हुए तो उनके डॉलर रिजर्व भी खतरे में पड़ सकते हैं।

यहीं से डॉलर को एक आर्थिक हथियार के रूप में देखने की धारणा मजबूत हुई।

ट्रंप की धमकियों से बढ़ी चिंता

पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने BRICS देशों को चेतावनी दी कि अगर वे डॉलर के विकल्प की ओर बढ़े, तो उन पर भारी टैरिफ लगाए जा सकते हैं। उनके पुराने फैसलों और प्रतिबंधों के रिकॉर्ड को देखते हुए कई देशों की चिंता और बढ़ गई है।

इस समय दुनिया भर के देशों के पास खरबों डॉलर का रिजर्व है, जिसे वे अब जोखिम भरा मानने लगे हैं।

क्यों बढ़ा रहे हैं देश गोल्ड रिजर्व

  • भरोसे के इसी संकट के कारण सेंट्रल बैंक तेजी से डॉलर घटाकर सोना खरीद रहे हैं।
  • चीन: पिछले दो दशकों में गोल्ड रिजर्व में करीब पांच गुना बढ़ोतरी
  • भारत: कुल विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी लगातार बढ़ी
  • डॉलर: वैश्विक रिजर्व में हिस्सेदारी धीरे-धीरे घटी
  • पोलैंड, तुर्किये जैसे देश भी अब बड़े पैमाने पर सोना जमा कर रहे हैं।

क्या खत्म हो जाएगा डॉलर का दौर?

विशेषज्ञ मानते हैं कि डॉलर की बादशाहत इतनी जल्दी खत्म नहीं होगी, क्योंकि आज भी दुनिया का बड़ा हिस्सा डॉलर में व्यापार करता है। हालांकि, चीन-रूस जैसे देशों का स्थानीय मुद्राओं में बढ़ता व्यापार यह संकेत देता है कि डॉलर को चुनौती मिल रही है।

आने वाले सालों में वैश्विक अर्थव्यवस्था में अस्थिरता बनी रह सकती है। इसी वजह से देश अपनी आर्थिक सुरक्षा के लिए सोने को सबसे भरोसेमंद विकल्प मान रहे हैं।

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