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बांग्लादेश: जमात-ए-इस्लामी की दोहरी रणनीति, महिलाओं और लोकतंत्र पर असर

जमात की वास्तविक पहचान

बांग्लादेश की कट्टर इस्लामी पार्टी जमात-ए-इस्लामी अपने “मध्यमार्गी” होने के दावे से बिल्कुल मेल नहीं खाती। पार्टी के संविधान में लिखा है कि सत्ता लोगों के पास नहीं, बल्कि ईश्वर के पास है, और उसका अंतिम लक्ष्य है “इकामत-ए-दीन” यानी इस्लाम को जीवन की पूर्ण व्यवस्था के रूप में स्थापित करना।

हांगकांग के अंग्रेजी अखबार एशिया टाइम्स की रिपोर्ट में कहा गया है:

“जमात ने ‘दोहरा संदेश’ देने की कला में महारत हासिल की है। कूटनीतिक बैठकों में नेता मधुर और आश्वस्त करने वाली बातें करते हैं, संवैधानिकता का जिक्र करते हैं और शरीयत कानून को तुरंत लागू करने से इनकार करते हैं। लेकिन जमीनी स्तर पर उनका असली चेहरा सामने आता है।”


मतदाता और आस्था का खेल

ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में, जहां असली चुनाव होते हैं:

  • वोट देना राजनीतिक विकल्प नहीं, बल्कि आस्था की परीक्षा बन जाता है।
  • जमात को वोट देना ‘अल्लाह का इनाम’ माना जाता है, और उसके खिलाफ वोट ‘नैतिक पतन’ के रूप में पेश किया जाता है।
  • चुनाव चिह्न ‘डारिपल्ला (तराजू)’ को वोट देना ईमानी कर्तव्य बताया जाता है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर कोई पार्टी बांग्लादेश के संविधान के प्रति सच्ची प्रतिबद्ध होती, तो उसकी नीतियां भी लोकतांत्रिक होतीं, लेकिन जमात ऐसा करने में असफल रही।


महिलाओं के खिलाफ नीतियां

जमात की सामाजिक नीतियां महिलाओं के अधिकारों को सीमित करती हैं:

  • घरेलू दायरे में रहना ‘इनाम’ माना जाता है।
  • कार्य समय घटाना और आवाजाही नियंत्रित करना।
  • महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता, जो बांग्लादेश की 450 अरब डॉलर अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, को समस्या माना जाता है।

पार्टी की नीति-निर्माण इकाई में एक भी महिला नहीं है।

वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि महिलाएं केवल महिलाओं के सामने ही भूमिका निभा सकती हैं।
यह कदम महिलाओं की सार्वजनिक जीवन, मीडिया और शिक्षा में दृश्यता को मिटाने का प्रयास है।


संरचनात्मक बहिष्कार और खतरा

रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है:

“अगर जमात नैतिकता पर एकाधिकार स्थापित करने में सफल होती है, तो कानूनी जवाबदेही की जगह नैतिक निश्चितता बैठाई जाएगी। इसका पहला शिकार वही कट्टरपंथी बहुसंख्यक मुस्लिम होंगे, जिसने इसे उभरने का अवसर दिया।”


जमात-ए-इस्लामी का दोहरा संदेश और महिला विरोधी नीतियां बांग्लादेश में लोकतंत्र और सामाजिक समरसता के लिए गंभीर चुनौती हैं।

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