ऑपरेशन सिंदूर से घबराया पाकिस्तान, अमेरिका से 66 बार मदद की गुहार — कॉल और ईमेल से खुला राज
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सेना की सख्त कार्रवाई ने पाकिस्तान को भीतर तक झकझोर दिया। ताज़ा दस्तावेज़ों से खुलासा हुआ है कि भारत के सैन्य अभियान को रोकने के लिए पाकिस्तान ने अमेरिका से बार-बार हस्तक्षेप की मांग की। कॉल, ईमेल और बैठकों के ज़रिए वॉशिंगटन में बैठे पाकिस्तानी अधिकारियों ने अमेरिकी सरकार, सांसदों और मीडिया से 60 से अधिक बार संपर्क साधने की कोशिश की।
📌 ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान की बेचैनी
ऑपरेशन सिंदूर के तहत भारत ने पाकिस्तान और पीओके में स्थित नौ आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया। पहलगाम आतंकी हमले के बाद यह कार्रवाई आतंकवाद के खिलाफ भारत की स्पष्ट नीति को दर्शाती है। सैन्य दबाव बढ़ते ही पाकिस्तान ने कूटनीतिक मोर्चे पर राहत की तलाश शुरू कर दी।
📌 कॉल और ईमेल से मांगा गया अमेरिकी हस्तक्षेप
दस्तावेज़ों के मुताबिक, ऑपरेशन शुरू होने से लेकर सीज़फायर लागू होने तक पाकिस्तान के राजदूत और डिफेंस अटैची ने अमेरिका में 66 बार संपर्क साधा। इन प्रयासों में अमेरिकी प्रशासन, सांसदों और प्रभावशाली मीडिया संस्थानों से भारत के अभियान को रोकने की मांग की गई।
📌वॉशिंगटन में लॉबिंग का पूरा नेटवर्क
सबूत बताते हैं कि पाकिस्तान ने केवल राजनयिक चैनलों पर ही भरोसा नहीं किया, बल्कि पेशेवर लॉबिंग फर्मों की भी मदद ली। नवंबर 2025 में आई एक रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान ने छह लॉबिंग कंपनियों के साथ सालाना करीब 5 मिलियन डॉलर के अनुबंध किए थे ताकि अमेरिका में अपनी बात प्रभावी तरीके से रखी जा सके।
📌 ट्रंप से मुलाकात और डील का कनेक्शन
इन समझौतों के कुछ ही समय बाद अमेरिका में पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल सैयद असीम मुनीर की व्हाइट हाउस में मेजबानी हुई। माना गया कि इन लॉबिंग प्रयासों का उद्देश्य अमेरिकी सत्ता के शीर्ष स्तर तक सीधी पहुंच बनाना और अपने पक्ष में माहौल तैयार करना था।
📌लॉ फर्म और सब-कॉन्ट्रैक्ट का खेल
जानकारी के अनुसार, सेडेन लॉ एलएलपी नामक फर्म ने इस प्रक्रिया में जेवलिन एडवाइजर्स को उपठेका दिया था, जो सरकारी संबंधों से जुड़ी एक विशेष एजेंसी है। इससे संकेत मिलता है कि पाकिस्तान ने रणनीतिक तौर पर अपने कूटनीतिक दबाव को संस्थागत रूप देने की कोशिश की।
🧠कूटनीतिक दबाव बनाम सैन्य कार्रवाई
ऑपरेशन सिंदूर ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया कि भारत आतंकवाद के खिलाफ केवल बयानबाज़ी नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई की नीति पर चल रहा है। वहीं, पाकिस्तान की ओर से बार-बार अमेरिकी हस्तक्षेप की मांग यह दर्शाती है कि सैन्य दबाव के सामने वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सहारे की तलाश करता रहा।
यह घटनाक्रम बताता है कि आने वाले समय में भारत-पाक संबंधों में सैन्य के साथ-साथ कूटनीतिक मोर्चे पर भी संघर्ष तेज़ हो सकता है, जहां अंतरराष्ट्रीय समर्थन हासिल करना रणनीति का अहम हिस्सा बनेगा।