66 साल का पानी विवाद: पंजाब ने उठाया 1.44 लाख करोड़ रुपये का बड़ा मुद्दा
पंजाब सरकार ने राजस्थान के साथ लंबे समय से चले आ रहे जल विवाद को एक बार फिर जोर-शोर से उठाया है। मुख्यमंत्री भगवंत मान ने दावा किया है कि राज्य 1960 से अब तक पानी के उपयोग का भारी बकाया नहीं चुका रहा है। उनके अनुसार यह राशि अब बढ़कर करीब 1.44 लाख करोड़ रुपये हो चुकी है। सरकार का कहना है कि यह केवल आर्थिक मुद्दा नहीं, बल्कि पंजाब के अधिकारों और संसाधनों से जुड़ा गंभीर विषय है, जिसे अब निर्णायक स्तर पर उठाया जाएगा।
1920 के समझौते का हवाला, रॉयल्टी भुगतान का दावा
मुख्यमंत्री ने 1920 में हुए एक त्रिपक्षीय समझौते का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय ब्रिटिश सरकार, बहावलपुर रियासत और बीकानेर के महाराजा के बीच पानी के बदले शुल्क देने की व्यवस्था तय हुई थी। इस समझौते के तहत राजस्थान (तत्कालीन बीकानेर) को पंजाब से मिलने वाले पानी के लिए भुगतान करना अनिवार्य था। पंजाब सरकार का दावा है कि 1960 तक यह भुगतान नियमित रूप से होता रहा, लेकिन उसके बाद अचानक इसे बंद कर दिया गया, जबकि पानी की आपूर्ति जारी रही।
1960 के बाद बदली स्थिति, लेकिन भुगतान बंद
पंजाब सरकार का आरोप है कि 1960 में सिंधु जल संधि के बाद नई व्यवस्थाएं लागू हुईं, लेकिन पुराने समझौते को औपचारिक रूप से समाप्त नहीं किया गया। इसके बावजूद राजस्थान ने पानी का उपयोग जारी रखा और भुगतान करना बंद कर दिया। मुख्यमंत्री का कहना है कि राजस्थान पानी लेने के लिए 1920 के समझौते का लाभ उठाता है, लेकिन भुगतान से बचने के लिए 1960 के समझौते का सहारा लेता है, जो कि न्यायसंगत नहीं है।
18,000 क्यूसेक पानी की आपूर्ति बना विवाद का केंद्र
पंजाब के अनुसार, वर्तमान में राजस्थान को फिरोजपुर और राजस्थान फीडर के माध्यम से लगभग 18,000 क्यूसेक पानी दिया जा रहा है। यह आपूर्ति दशकों से जारी है और इसी आधार पर बकाया राशि का आकलन किया गया है। सरकार का कहना है कि इतने बड़े स्तर पर पानी की आपूर्ति के बावजूद एक भी रुपया भुगतान न होना राज्य के लिए आर्थिक नुकसान का कारण बना है। इस मुद्दे को लेकर अब सख्त रुख अपनाने की बात कही जा रही है।
हर 25 साल में समीक्षा का नियम भी हुआ नजरअंदाज
मुख्यमंत्री ने यह भी बताया कि 1920 के समझौते के तहत हर 25 साल में इसकी समीक्षा अनिवार्य थी, लेकिन पूर्व सरकारों ने इस दिशा में कोई पहल नहीं की। उनके अनुसार, अगर समय-समय पर समीक्षा होती रहती तो यह विवाद इतना बड़ा रूप नहीं लेता। पंजाब सरकार अब इस पूरे मामले की दोबारा समीक्षा कराने और पुराने अधिकारों को पुनः स्थापित करने की योजना बना रही है।
राजस्थान को पत्र, केंद्र सरकार को भी किया जाएगा शामिल
पंजाब सरकार ने इस मुद्दे पर औपचारिक कदम उठाते हुए राजस्थान सरकार को पत्र लिखकर बातचीत का प्रस्ताव दिया है। मुख्यमंत्री भगवंत मान ने स्पष्ट किया कि यदि जरूरत पड़ी तो केंद्र सरकार को भी इस मामले में शामिल किया जाएगा। उन्होंने कहा कि पंजाब अपने अधिकारों की रक्षा के लिए हर संभव मंच पर इस मुद्दे को उठाएगा और बकाया राशि की वसूली के लिए पूरी ताकत लगाएगा।