350वां शहीदी दिवस : धर्म–मानवता–अधिकारों की रक्षा का अमर संघर्ष बलिदान जिसकी मिसाल इतिहास में दुर्लभ…
सन 1675 में दिल्ली के चांदनी चौक में वह घड़ी इतिहास का अमर अध्याय बन गई, जब सिख धर्म के नौवें गुरु श्री गुरु तेग बहादुर जी और उनके तीन महान साथियों—भाई मति दास, भाई सती दास और भाई दयाला जी—ने अत्याचार, धार्मिक कट्टरता और जबरन धर्मांतरण के विरुद्ध सिर कुर्बान कर दिया।
आज उनका 350वां शहीदी दिवस न केवल सिख इतिहास बल्कि पूरी मानवता के लिए प्रेरणा का दिन है।
“हिंद दी चादर” गुरु तेग बहादुर : अत्याचार के विरुद्ध अदम्य साहस ,कश्मीरी पंडितों की रक्षा के लिए अपना शीश न्योछावर
गुरु तेग बहादुर जी ने उस समय खड़े होकर आवाज उठाई जब औरंगज़ेब की नीतियों के कारण कश्मीरी पंडितों पर जबरन इस्लाम स्वीकारने का दबाव बढ़ रहा था।
पंडितों के एक प्रतिनिधिमंडल के अनुरोध पर गुरु जी ने कहा था—
“यदि मेरा बलिदान कश्मीरियों की रक्षा कर सकता है, तो मेरा सिर तैयार है।”
यह एक ऐसा निर्णय था जिसने धार्मिक स्वतंत्रता की नींव को मजबूत किया।
गिरफ्तारी और अत्याचारों का दौर , सत्य और धर्म के लिए जेल की दीवारें भी न डिगा सकीं
गुरु तेग बहादुर जी और उनके तीन साहसी साथियों को
आनंदपुर साहिब से गिरफ्तार कर दिल्ली लाया गया।
उनपर धर्म परिवर्तन का दबाव डाला गया, पर गुरु जी ने साफ शब्दों में कहा—
“मानव धर्म किसी भी कीमत पर नहीं बिक सकता।”
भाई मति दास की शहादत ,आरी से चीर दिया गया, पर ‘वाहेगुरु’ की आवाज नहीं टूटी
भाई मति दास को दो खंभों से बांधकर आरी से चीर दिया गया।
इतने अमानवीय अत्याचार के बावजूद उनके होठों से लगातार सिमरन की ध्वनि निकलती रही।
उनकी शहादत धर्म के लिए अटूट निष्ठा का प्रतीक बन गई।
भाई दयाला जी का बलिदान ,उबलते तेल की कड़ाही में बैठाकर भी नहीं बदला विश्वास
भाई दयाला जी को उबलते तेल की कड़ाही में डाल दिया गया।
परंतु उन्होंने धर्म परिवर्तन तो क्या, एक क्षण के लिए भी भय प्रदर्शित नहीं किया।
उनका धैर्य आज भी संसार को अडिगता का संदेश देता है।
भाई सती दास की शहादत ,
रूई में लपेटकर जिंदा जलाया गया, पर मन अडोल
भाई सती दास को रूई में लपेटकर आग लगा दी गई।
जलते हुए भी उन्होंने गुरु और धर्म के मार्ग से हटने से साफ इनकार कर दिया।
उनकी शहादत आत्मिक शक्ति का असाधारण उदाहरण है।
गुरु तेग बहादुर जी का अंतिम बलिदान
चांदनी चौक में कटा सिर, जन्मी मानवाधिकारों की नई रोशनी
11 नवम्बर 1675 को चांदनी चौक में गुरु जी का सिर तन से अलग कर दिया गया। परंतु यह केवल एक व्यक्ति का बलिदान नहीं था— यह धार्मिक स्वतंत्रता, मानवीय गरिमा और न्याय की रक्षा के लिए दिया गया अमर संदेश था।
गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपने पिता को यह उपाधि दी—
“हिंद की चादर”—हिंदुस्तान की रक्षा करने वाला।
दो साहसी परिवारों का अनोखा योगदान
भाई जैता जी (भाई जीता जी, बाद में भाई जीवान सिंह) गुरु जी का सिर दिल्ली से उठाकर
सभी बाधाओं के बीच आनंदपुर साहिब ले गए। वंजारा परिवार ने गुरु जी के शरीर का संस्कार अपने घर में आग लगाकर किया,
ताकि मुगल सैनिकों की नजरों से बचाया जा सके।
“धर्म की स्वतंत्रता सबसे बड़ा अधिकार”
इन बलिदानों ने यह सिद्ध किया, किसी भी धर्म को जबरदस्ती नहीं थोपा जा सकता ,अन्याय और क्रूरता के सामने सत्य ही सबसे बड़ा हथियार है , मानवाधिकारों की रक्षा के लिए खड़ा होना ही सच्चा धर्म है, बलिदान शरीर का नहीं—आत्मा की अजेय शक्ति का प्रमाण है
350वां शहीदी वर्ष : क्यों है अत्यंत महत्वपूर्ण?
आज की दुनिया के लिए भी उतनी ही प्रासंगिक सीख है जिसमें धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान , समाज में बराबरी की भावना ,अत्याचार के विरोध में आवाज उठाने का साहस , मानवता के मूल्यों की रक्षा आज 350 साल बाद भी यह संदेश दुनिया के हर कोने में उतना ही प्रासंगिक है। गुरु तेग बहादुर जी और उनके तीन वीर साथियों का बलिदान कोई धार्मिक घटना नहीं—यह मानवता की रक्षा का विश्व इतिहास का सबसे बड़ा उदाहरण है।