राजस्थान के राज्य वृक्ष खेजड़ी पर संकट, बालोतरा में 50 से अधिक पेड़ सूखने लगे; वैज्ञानिक जांच की मांग
राजस्थान के राज्य वृक्ष खेजड़ी पर बालोतरा जिले के गिड़ा क्षेत्र में संकट के संकेत सामने आए हैं। कुम्पलिया ग्राम पंचायत के चौधरी भूनारामजी गोदारा नगर में हरे-भरे खेजड़ी के पेड़ अचानक सूखने लगे हैं। ग्रामीणों के अनुसार, पेड़ों के तनों और जड़ों के आसपास जमीन पर चूने या पत्थर जैसी कठोर सफेद परत जम रही है। इससे क्षेत्र में 50 से अधिक पेड़ों के प्रभावित होने की आशंका है। खाद और कीटनाशकों से किए गए शुरुआती उपचार भी कारगर नहीं हुए। अब किसानों और पर्यावरण प्रेमियों ने प्रशासन से वैज्ञानिक जांच कराकर समस्या का वास्तविक कारण पता लगाने की मांग की है।
बालोतरा के गिड़ा क्षेत्र में खेजड़ी के पेड़ों पर संकट
बाड़मेर क्षेत्र की पारिस्थितिकी और ग्रामीण जीवन में खेजड़ी का महत्वपूर्ण स्थान है। बालोतरा जिले के गिड़ा क्षेत्र की ग्राम पंचायत कुम्पलिया के राजस्व गांव चौधरी भूनारामजी गोदारा नगर में इस पेड़ के सूखने की शिकायत सामने आई है।स्थानीय लोगों के मुताबिक, खेतों में लगे कई हरे-भरे पेड़ धीरे-धीरे सूख रहे हैं। पेड़ों की जड़ों और तनों के आसपास जमीन पर सफेद, कठोर परत दिखाई दे रही है। ग्रामीणों ने इसकी तुलना चूने या पत्थर जैसी जमावट से की है।स्थानीय स्तर पर 50 से अधिक खेजड़ी के पेड़ों के प्रभावित होने की बात कही गई है। कुछ अन्य पेड़ों में भी ऐसे लक्षण दिखाई देने की जानकारी मिली है। हालांकि, प्रभावित पेड़ों की वास्तविक संख्या और उनके सूखने का कारण वैज्ञानिक जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।
जड़ों के आसपास सफेद परत जमने से बढ़ी चिंता
कुम्पलिया के पूर्व पंच रणधीर सिंह गोदारा के अनुसार, पेड़ों की जड़ों के आसपास सफेद परत बन रही है। उन्होंने पेड़ों को बचाने के लिए पानी, खाद और कीटनाशकों से उपचार कराने का प्रयास किया, लेकिन अपेक्षित परिणाम नहीं मिले।जड़ों के आसपास ऐसी परत बनने के कई संभावित कारण हो सकते हैं। इनमें मिट्टी में लवणों का जमाव, अधिक क्षारीयता, सिंचाई के पानी की गुणवत्ता, जल निकास की समस्या या जड़ों से जुड़े रोग शामिल हैं।हालांकि, इनमें से किसी कारण की अभी पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए केवल दिखाई देने वाले लक्षणों के आधार पर बीमारी या मिट्टी की समस्या का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। प्रभावित पेड़ों, आसपास की मिट्टी और सिंचाई के पानी की जांच जरूरी है।
खेजड़ी राजस्थान के पर्यावरण और किसानों के लिए क्यों जरूरी?
खेजड़ी राजस्थान के शुष्क और अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह कम पानी वाले वातावरण में भी जीवित रह सकती है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था तथा पर्यावरण को कई तरह से सहारा देती है।
खेजड़ी की प्रमुख उपयोगिताएं इस प्रकार हैं:
- पशुओं के लिए चारा: इसकी पत्तियां और लूंग सूखे तथा अकाल के समय पशुओं के लिए उपयोगी चारा उपलब्ध कराते हैं।
- सांगरी: खेजड़ी की फलियां यानी सांगरी राजस्थान के पारंपरिक खानपान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
- मिट्टी की उर्वरता: यह मिट्टी की गुणवत्ता और पोषक तत्वों के चक्र में योगदान देती है।
- पर्यावरण संरक्षण: पेड़ स्थानीय जैव विविधता को सहारा देते हैं और खेतों के पारिस्थितिक संतुलन में भूमिका निभाते हैं।
- किसानों की आजीविका: खेजड़ी चारे, सांगरी और कृषि भूमि के पर्यावरणीय लाभों के जरिए ग्रामीण परिवारों के लिए उपयोगी है।
ऐसे में बड़ी संख्या में खेजड़ी के पेड़ों का सूखना स्थानीय किसानों और पर्यावरण प्रेमियों के लिए चिंता का विषय है।
खाद और कीटनाशकों से उपचार सफल नहीं होने की बात
रणधीर सिंह गोदारा के अनुसार, पेड़ों को बचाने के लिए शुरुआती स्तर पर खाद, पानी और कीटनाशकों का इस्तेमाल किया गया, लेकिन समस्या दूर नहीं हुई। इससे अब वैज्ञानिक जांच की जरूरत और बढ़ गई है।विशेषज्ञों के मुताबिक, किसी पेड़ के सूखने का कारण जाने बिना बार-बार खाद या कीटनाशक डालना प्रभावी समाधान नहीं हो सकता। यदि समस्या मिट्टी में लवणों के जमाव या सिंचाई के पानी की गुणवत्ता से जुड़ी है, तो उपचार का तरीका अलग होगा। वहीं, यदि जड़ों में रोग है, तो उसकी पहचान के लिए अलग जांच की आवश्यकता पड़ सकती है।इसलिए आगे किसी भी उपचार से पहले मिट्टी, पानी और जड़ों के नमूनों की जांच कराना उपयोगी रहेगा। इससे समस्या के अनुसार उचित कदम उठाने में मदद मिल सकती है।
कृषि विश्वविद्यालय और विभाग की संयुक्त टीम से जांच की मांग
कृषि विशेषज्ञ डॉ. कृष्णा सहारण, सहायक आचार्य, कृषि विश्वविद्यालय जोधपुर के अनुसार, प्रभावित और स्वस्थ पेड़ों के आसपास की मिट्टी, सिंचाई के पानी तथा जड़ों की जांच कराना जरूरी है।उन्होंने सुझाव दिया कि कृषि विश्वविद्यालय और कृषि विभाग की संयुक्त टीम क्षेत्र का सर्वे कर सकती है। जांच में मिट्टी की गुणवत्ता, लवणता, क्षारीयता, पानी की स्थिति और जड़ों के स्वास्थ्य की तुलना की जा सकती है।ऐसी वैज्ञानिक जांच से यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि पेड़ों के सूखने की वजह किसी स्थानीय पर्यावरणीय बदलाव, मिट्टी की समस्या या रोग से जुड़ी है। इसके बाद ही उपचार की प्रभावी योजना बनाई जा सकेगी।
जिला परिषद सदस्य ने कलेक्टर को पत्र लिखकर मांगी कार्रवाई
जिला परिषद सदस्य दौलताराम गोदारा ने इस समस्या को लेकर जिला कलेक्टर को पत्र लिखकर विशेषज्ञों की टीम भेजने की मांग की है। उन्होंने प्रभावित खेजड़ी के पेड़ों को बचाने के लिए जल्द वैज्ञानिक जांच और आवश्यक उपचार कराने पर जोर दिया।दौलताराम गोदारा के अनुसार, खेजड़ी का पौधा तैयार होने और बड़ा पेड़ बनने में कई वर्षों का समय लगता है। इसलिए इन पेड़ों को सूखने से बचाने के लिए समय रहते कार्रवाई जरूरी है।अब प्रशासन और कृषि विभाग की ओर से सर्वे तथा जांच की पहल महत्वपूर्ण होगी। प्रभावित पेड़ों की स्थिति का आकलन कर वास्तविक कारण का पता लगाया जाता है, तो उसी आधार पर उपचार और संरक्षण के कदम उठाए जा सकते हैं।
वैज्ञानिक जांच के बाद ही स्पष्ट होगा सूखने का कारण
बालोतरा के गिड़ा क्षेत्र में खेजड़ी के पेड़ों के सूखने की शिकायत ने राज्य वृक्ष के संरक्षण का मुद्दा सामने ला दिया है। सफेद कठोर परत, जड़ों की स्थिति और उपचार के शुरुआती प्रयासों की जानकारी जांच के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है।फिलहाल पेड़ों के सूखने का वास्तविक कारण प्रमाणित नहीं हुआ है। इसलिए मिट्टी, सिंचाई के पानी और जड़ों की वैज्ञानिक जांच जरूरी है। जांच रिपोर्ट के आधार पर ही उचित उपचार तय किया जा सकेगा।अब किसानों और पर्यावरण प्रेमियों की नजर प्रशासन की कार्रवाई पर है। समय रहते वैज्ञानिक जांच और प्रभावी उपचार शुरू होने से प्रभावित खेजड़ी के पेड़ों को बचाने की संभावनाओं का आकलन किया जा सकेगा।